सम्पूर्ण पाठ
॥ दोहा ॥
जय काली जगदम्ब जय, हरनि ओघ अघ पुंज।
वास करहु निज दास के, निशदिन हृदय निकुंज॥
जयति कपाली कालिका, कंकाली सुख दानि।
कृपा करहु वरदायिनी, निज सेवक अनुमानि॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय काली कंकाली।
जय कपालिनी, जयति कराली॥
जय अघहारी, जय दुःखहारी।
जय महिषासुर मर्दनकारी॥
जय चण्ड-मुण्ड विनाशिनि माता।
जय रक्तबीज संहारिनि दाता॥
जय शुम्भ-निशुम्भ विदारिणि।
जय मधु-कैटभ संहारिणि॥
जय जगदम्ब भवानी माता।
जय आदिशक्ति जगत विख्याता॥
तुम ही ब्रह्मा, तुम ही विष्णु।
तुम ही शंकर, तुम ही इन्द्र॥
तुम ही धाता, तुम ही विधाता।
तुम ही जग की पालन माता॥
तुम ही शक्ति सकल संसार।
तुम बिन कौन करे उद्धार॥
भक्तन की तुम हो रखवारी।
दुष्टन की तुम हो संहारी॥
जो नर तुमको ध्यान लगावे।
सो नर मनवांछित फल पावे॥
दीन-दुखी जो शरण तुम्हारी।
ताकी विपदा हरो हमारी॥
रोग शोक संताप नसावो।
संकट सबके दूर भगावो॥
धन धान्य सुख सम्पत्ति दाता।
तुम हो जग की भाग्य विधाता॥
निशदिन जो तुम्हें ध्यावे।
ताकी मनोकामना पावे॥
जो जन तुम्हरी पूजा करते।
ते नर भवसागर से तरते॥
काली नाम जपै जो कोई।
तापर कृपा करहु तुम सोई॥
काली काली कहत पुकारा।
मातु करो अब दुःख से न्यारा॥
तुम्हरी महिमा अगम अपारा।
वेद पुरान करें जयकारा॥
देव मुनि सब ध्यान लगावें।
तुम्हरे चरणों में शीश नवावें॥
तुम हो माता जग की रानी।
तुम बिन कौन सुने अरदानी॥
करहु कृपा हे मातु भवानी।
राखहु लाज हमारी रानी॥
अपराध क्षमा करो जननी।
दीन दयालु जगत की धनी॥
शरण पड़े जो नर तुम्हारी।
तुम रखती हो लाज हमारी॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ताकी विपदा दूर हो जाई॥
सुख सम्पत्ति घर में आवै।
रोग दोष सब दूर भगावै॥
काली चालीसा जो नर गावे।
सकल मनोरथ सिद्धि पावे॥
भूत प्रेत बाधा नस जावे।
शत्रु निकट नहीं आ पावे॥
मातु कृपा जो पावे कोई।
जीवन सफल होय सुख होई॥
जय जय जय काली महारानी।
करहु कृपा अम्बे कल्याणी॥
॥ अंतिम दोहा ॥
जय काली जय कालिका, जय जगदम्ब भवानी।
दीनन पर दया करहु, मातु भवानी कल्याणी॥
॥ समाप्त ॥